दुर्गापुर | १ फरवरी, २०२६
जब सत्ता की चुप्पी डराने लगे और वक्त की स्याही धुंधली पड़ने लगे, तब रचनाकार की कलम ही मशाल बनती है। औद्योगिक नगरी दुर्गापुर के 'यू.सी.डब्ल्यू. यूनियन' कार्यालय में आज कुछ ऐसा ही मंजर था। अवसर था जनवादी लेखक संघ (जलेस), पश्चिम वर्धमान जिला समिति के छठे सम्मेलन का, जहाँ शब्द केवल कागज पर नहीं उतरे, बल्कि हक की लड़ाई का हथियार बनकर उभरे।
स्मृतियों के दीप और संघर्ष का संगीत
यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि एक भावनात्मक मिलन था। सम्मेलन स्थल का नामकरण संगठन के पूर्व सचिव स्व. डॉ. संतराम की स्मृति को समर्पित किया गया। जैसे ही दीप प्रज्वलित हुए, उनकी यादों की लौ हर प्रतिनिधि की आँखों में चमक उठी। राजेश्वर शर्मा द्वारा प्रस्तुत शोक प्रस्ताव ने उन तमाम साथियों को नमन किया जिन्होंने इस वैचारिक यात्रा में साथ निभाया। 'सेतु' सांस्कृतिक दल के उद्घाटन संगीत ने माहौल में वह जोश भर दिया, जो किसी भी बड़े बदलाव की पहली आहट होता है।
प्रस्तावों में दहकता वर्तमान
राज्य कमेटी की ओर से दिनेश झा ने सम्मेलन का विधिवत आगाज़ किया। डॉ. अरुण कुमार पांडेय ने जब मसौदा प्रस्ताव पेश किया, तो उसमें समय की विभीषिका और लेखकों की जिम्मेदारी साफ झलक रही थी। सम्मेलन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर इन मुद्दों पर आर-पार की लड़ाई का संकल्प लिया गया:
अभिव्यक्ति की आज़ादी का संरक्षण।
सांप्रदायिकता और फासीवाद के जहर के खिलाफ डटकर खड़े होना।
भ्रष्टाचार, दलित, अल्पसंख्यक और महिला उत्पीड़न पर कलम की चोट।
शोषक लेबर कोड का विरोध और १२ फरवरी की हड़ताल को पूर्ण समर्थन।
एकजुटता का कारवां
इस वैचारिक महाकुंभ में केवल लेखक ही नहीं, बल्कि समाज के हर सचेत वर्ग की आवाजें शामिल हुईं। पश्चिम बंग लोकतांत्रिक लेखक संघ से अनूप मित्र, इप्टा (IPTA) से आशीष तरु चक्रवर्ती, आदिवासी लोकशिल्पी संघ से गोपीनाथ मुर्मू और विज्ञान मंच के धनुष धारी राय ने अपनी शुभकामनाओं से संघर्ष के इस साझा मंच को और मजबूत किया। वासिम आलम ने राज्य संगठन की ओर से जोश भरा अभिनंदन किया।
नई कमान, नया संकल्प
सम्मेलन के अंतिम पड़ाव पर सर्वसम्मति से नई कार्यकारिणी का चुनाव हुआ, जो आने वाले समय में जिले में जनवादी चेतना का विस्तार करेगी:
अध्यक्ष: तारकेश्वर पाण्डेय
कार्यकारी अध्यक्ष: जीतेन्द्रनाथ उपाध्याय
सचिव: डॉ. अरुण कुमार पाण्डेय
कोषाध्यक्ष: विजय ठाकुर
सम्मेलन का समापन इस भरोसे के साथ हुआ कि जब तक जुल्म रहेगा, प्रतिरोध के गीत गाए जाते रहेंगे।










